ACE 2026 : जिस शोध को मिला तिरस्कार, उसी ने प्रजनन चिकित्सा को दी नई दिशा
Pragya News 24
Sun, Aug 9, 2026
आगरा। टेस्ट ट्यूब बेबी यानी IVF तकनीक का इतिहास उपलब्धि के साथ-साथ एक प्रतिभाशाली भारतीय वैज्ञानिक की उपेक्षा की पीड़ा भी समेटे हुए है। 25 जुलाई 1978 को इंग्लैंड में दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी के जन्म के बाद 3 अक्टूबर 1978 को भारत में दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी के जन्म ने चिकित्सा विज्ञान में नया इतिहास रचा। इस उपलब्धि से जुड़े भारतीय वैज्ञानिक डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय ने स्टिम्युलेशन साइकिल IVF तकनीक के माध्यम से इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुए इस ऐतिहासिक प्रयोग से अग्रवाल दंपती को कन्या संतान प्राप्त हुई, जिसे दुर्गा नाम दिया गया। डॉ. मुखोपाध्याय के योगदान और उस दौर की परिस्थितियों पर एसीई 2026 में चर्चा करते हुए कलकत्ता से आईं डॉ. इंद्राणी लोध ने भारतीय IVF इतिहास के इस महत्वपूर्ण अध्याय को सामने रखा।
शोध को नहीं मिला अपेक्षित सहयोग
डॉ. इंद्राणी लोध ने बताया कि डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय ने IVF के साथ-साथ अंडाणु एवं शुक्राणु संरक्षण की क्रायो-फ्रीजिंग तकनीक पर भी महत्वपूर्ण शोध किया था। उनके अनुसार, उस समय के प्रशासनिक और राजनीतिक माहौल में डॉ. मुखोपाध्याय को अपने शोध के लिए अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उनके कार्यों को लेकर सवाल उठे और उन्हें उपेक्षा एवं मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि डॉ. मुखोपाध्याय अपने शोध कार्य को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने के लिए जापान जाना चाहते थे, लेकिन उन्हें अनुमति नहीं मिल सकी। लगातार उपेक्षा और मानसिक तनाव के बीच उन्होंने वर्ष 1981 में आत्महत्या कर ली। उनकी असामयिक मृत्यु भारतीय वैज्ञानिक इतिहास का एक बेहद दुखद अध्याय मानी जाती है।
डॉ. लोध ने कहा कि दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी के ऐतिहासिक प्रयास से जुड़े प्रो. बी.एन. चक्रवर्ती के साथ काम करने के दौरान उन्होंने इस इतिहास को करीब से समझा। उन्होंने कहा कि यदि डॉ. मुखोपाध्याय को उस समय पर्याप्त संस्थागत और वैज्ञानिक सहयोग मिला होता, तो भारत प्रजनन चिकित्सा के क्षेत्र में और भी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकता था।
आज वही तकनीक बनी उम्मीद की किरण
डॉ. लोध के अनुसार, डॉ. मुखोपाध्याय द्वारा किए गए शुरुआती शोध ने भारत में IVF एवं प्रजनन चिकित्सा के विकास की आधारभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज आधुनिक IVF तकनीकों के माध्यम से दुनिया भर में निसंतान दंपतियों को संतान प्राप्ति के नए विकल्प उपलब्ध हो रहे हैं।
एक समय जिस वैज्ञानिक को अपने ही देश में अपने शोध की स्वीकार्यता के लिए संघर्ष करना पड़ा, आज उनकी वैज्ञानिक विरासत प्रजनन चिकित्सा के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह कहानी इस बात की भी याद दिलाती है कि वैज्ञानिक प्रतिभा को समय पर सहयोग, संसाधन और उचित मंच मिलना कितना आवश्यक है।
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