: मां ही नहीं पिता भी दे सकते हैं नवजात को केएमसी, नवजात शिशु देखभाल सप्ताह में विशेष
Thu, Nov 21, 2024
नवजात के लिए औषधि साबित होता है कंगारू मदर केयर
प्री-टर्म बर्थ/ लो बर्थ वेट शिशु /एक स्थान से दूसरे स्थान बच्चे को संदर्भित करते समय ठंड से बचाव हेतु बच्चों को दी जाती है केएमसी
आगरा । समय से पहले बच्चे का जन्म हुआ हो (प्री-टर्म बर्थ), जन्म के वक्त कम वजन हो (लो बर्थ वेट) या हाइपोग्लेसिमिया से बचाव हेतु चिकित्सक मां के स्पर्श को औषधि के रूप में उपयोग करते हैं। इसे कंगारू मदर केयर कहा जाता है। लेकिन जब मां ही कठिन परिस्थिति में हो तो पिता भी केएमसी दे सकते हैं। जिला महिला चिकित्सालय (लेडी लॉयल) स्थित केएमसी यूनिट में वर्ष 2024 में अब तक 896 से ज्यादा बच्चों को केएमसी के जरिए स्वस्थ किया गया है। इनमें से 25 बच्चों को उनके पिता, ताऊ, चाचा इत्यादि ने केएमसी दिया है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण श्रीवास्तव ने बताया कि कंगारू मदर केयर एक नर्सिंग तकनीक है, विशेष रूप से समय से पहले जन्मे शिशुओं सहित विभिन्न परिस्थितियों में नवजात की जान बचाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। जिला महिला चिकित्सालय में अलग से केएमसी यूनिट बनाई गई है, जहां पर नवजात को केएमसी दी जाती है और इसका प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इस प्रक्रिया में नवजात को उसकी मां के साथ सीधे त्वचा से त्वचा संपर्क में रखा जाता है, जिससे शारीरिक और भावनात्मक समर्थन मिलता है। यह तकनीक शिशु के स्वास्थ्य और विकास को बढ़ाने में मदद करती है। जब मां कठिन परिस्थिति में होती हैं तो पिता भी इसे दे सकते हैं।
जिला महिला चिकित्सालय (लेडी लॉयल) की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. खुशबू केसरवानी बताती हैं कि जिला महिला अस्पताल में जन्म लेने वाले औसतन 15 से 18 प्रतिशत बच्चे कम वजन के होते हैं। इन्हें केएमसी यूनिट में रखा जाता है। कंगारू मदर केयर ऐसी प्रक्रिया है, जिसके जरिये, बच्चों के वजन को बढाया जा सकता है, साथ ही यह शरीर का तापमान व श्वास प्रक्रिया को स्थिर रखने में सहायक होता है। इसमें मां बच्चे को अपने से इस तरह से चिपकाकर रखती हैं जैसे कंगारू अपने बच्चे को अपने शरीर से चिपकाकर रखता है। केएमसी में मां बच्चों को कम से कम छह से आठ घंटे तक अपनी त्वचा से लगाकर रखती हैं और धीरे धीरे इस समय को बढ़ाना होता है। इससे बच्चे और मां का जुड़ाव बढ़ता है। बच्चा मां की खुशबू को पहचानने लगता है। मां बच्चे की धड़कन को पहचानने लगती है। इससे मां को दूध भी आने लगता है। इससे छह माह तक केवल स्तनपान भी सुनिश्चित होता है। उन्होंने बताया कि जब बच्चे का वजन ढाई किलोग्राम हो जाता है तो बच्चा वातावरण में सर्वाइव करने लायक हो जाता है। कई बार मां की तबियत खराब हो या वो नवजात को केएमसी न देने की स्थिति में हो तो पिता या परिवार का कोई और सदस्य भी नवजात को केएमसी दे सकता है।
जिला महिला चिकित्सालय (लेडी लॉयल) में तैनात नर्सिंग ऑफिसर प्रियंका सिंह ने बताया कि केएमसी यूनिट में हम मां और परिजनों को केएमसी का प्रशिक्षण देते है। हम यहां पर तकनीकों का प्रयोग कर टेलीविजन पर वीडियो दिखाकर उन्हें केएमसी का प्रशिक्षण देते हैं। केएमसी में मिले प्रशिक्षण को मां घर पर जाकर भी अपनाती हैं। इससे बच्चे स्वस्थ रहते हैं। इसके साथ ही जिन मां को दूध नहीं आता है उन्हें दूध आने की समस्या भी दूर हो जाती है। इसके अलावा यदि मां कंगारू मदर केयर करने में असमर्थ है तो अन्य सदस्य भी इसको कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि जनवरी 2024 से अब तक केएमसी यूनिट में 896 नवजात शिशुओं को केएमसी दी जा चुकी है, इनमें से 25 पुरुषों ने नवजात शिशुओं को केएमसी दी है।
ताजनगरी निवासी 30 वर्षीय मुश्ताक बताते हैं कि मेरी पत्नी शाजिया ने सात नवंबर 2024 को दो जुड़वां बच्चों को जन्म दिया, जिनका वजन 1600 ग्राम और 1800 ग्राम था, जो काफी कम था। वजन कम होने की स्थिति में नर्सिंग ऑफिसर प्रियंका सिंह दोनों नवजात को कंगारू मदर केयर देने की जानकारी दी। उन्होंने जिला महिला अस्पताल स्थित केएमसी यूनिट में मेरी पत्नी शाजिया और मुझे केएमसी का प्रशिक्षण दिया। एक बच्चे को मेरी पत्नी और दूसरे को मेरे द्वारा केएमसी दी गई। यह एक अलग तरह का अहसास है। पहले मुझे लगा कि केवल मां ही केएमसी दे सकती हैं।
ब्लॉक सैंया के ग्राम सिकंदरपुर के निवासी 36 वर्षीय भोलाराम ने बताया कि मेरे भाई की पत्नी अंजलि ने दो नवंबर को निजी चिकित्सालय में बेटे को जन्म दिया। बच्चे के जन्म के बाद जच्चा को अधिक रक्तस्राव होने लगा, जिसके चलते उनकी मृत्यु हो गई थी। जब हम घर चले गए तो बच्चा ठंडा पड़ गया था, ऐसे में हम जिला महिला चिकित्सालय में आए, यहां पर डॉक्टरों ने बच्चे को उपचार दिया और उसे केएमसी यूनिट में भर्ती कराया गया। मेरा भाई विकलांग है, इस कारण मुझे वीडियो के माध्यम से स्टाफ ने केएमसी का प्रशिक्षण दिया। इसके बाद मैंने बच्चे को केएमसी दी। अब बच्चा डिस्चार्ज हो गया है और डॉक्टर ने घर पर भी केएमसी देने की सलाह दी है। अब घर पर भी मैं ही बच्चे को केएमसी दे रहा हूं। बच्चा अब स्वस्थ है।
कंगारू मदर केयर के फायदे
बच्चे का तापमान स्थिर रहता है
मां और बच्चे का जुड़ाव बढ़ता है
बच्चे की ग्रोथ तेजी से होती है
नवजात का वजन तेजी से बढ़ता है
मां को दूध आने लगता है
पिता की भागीदारी के लाभ
शिशु के साथ मजबूत बंधन बनाने में मदद।
माता को आराम और समर्थन प्रदान करना।
शिशु की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करना।
परिवार में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाना।
पिता की भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक संतुष्टि।
नवजात शिशु को यह दे सकते हैं केएमसी
दादी/नानी: यदि मां और पिता किसी कारणवश शिशु की देखभाल नहीं कर पा रहे हैं, तो दादी/नानी कंगारू मदर केयर दे सकती हैं।
दादा/नाना: यदि मां और पिता किसी कारणवश शिशु की देखभाल नहीं कर पा रहे हैं, तो दादा/नाना भी कंगारू मदर केयर दे सकते हैं।
परिवार के अन्य सदस्य: परिवार के अन्य सदस्य जैसे कि चाची, चाचा, भाई, बहन आदि भी कंगारू मदर केयर दे सकते
: भ्रांतियों से दूर रहकर अपनाएं पुरुष नसबंदी, नहीं आती कोई कमजोरी
Thu, Nov 21, 2024
जिला परिवार नियोजन की ओर से शुरू हुआ पुरुष नसबंदी पखवाड़ा
‘आज ही शुरूआत करें, पति पत्नी मिलकर परिवार नियोजन की बात करें’ की थीम रखी गई
पुरुष नसबंदी: परिवार को नियोजित करने का एक सुरक्षित और सरल तरीका
आगरा। जिले में परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत पुरुष नसबंदी पखवाड़ा 21 नवंबर से 4 दिसंबर तक मनाया जाएगा। इस पखवाड़ा का उद्देश्य परिवार कल्याण कार्यक्रमों में पुरुषों की सहभागिता बढ़ाना है। इस वर्ष की थीम है ष्आज ही शुरूआत करें, पति पत्नी मिलकर परिवार नियोजन की बात करेंष्। रखी गई है। परिवार नियोजन की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की ही नहीं है। इसमें न सिर्फ पुरुषों को भागीदारी निभानी चाहिए, बल्कि साधन अपनाने के लिए खुद भी आगे आना चाहिए। पुरुष भागीदारी के साधन सरल और सुरक्षित भी हैं।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरूण श्रीवास्तव ने बताया कि परिवार नियोजन के लिए हर वर्ष की तरह इस बार भी 21 नवंबर से जिले में पुरुष नसबंदी पखवाड़ा मनाया जाएगा। दो चरणों में मनाए जाने वाले पखवाड़े के पहले चरण में 21 से 27 नवंबर तक दंपति संपर्क सप्ताह के रूप में तथा दूसरा चरण 28 से 4 दिसंबर तक सेवा वितरण सप्ताह के रूप में मनाया जाएगा। मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि एनएसवी विधि के द्वारा किए जाने वाली पुरुष नसबंदी में न तो चीरा लगता है, न टांका लगता है और न ही पुरुष की पौरुष क्षमता में कमी या कमजोरी होती है। यह सरल ऑपरेशन, प्रशिक्षित सर्जन के द्वारा मात्र 10 मिनट में कर दिया जाता है। ऑपरेशन के दो दिनों के बाद से लाभार्थी सामान्य कार्य एवम सात दिनों के बाद भारी काम कर सकते हैं। नसबंदी करवाने पर पुरुष लाभार्थी को 3000 रुपया मिलता है वहीं प्रेरक को प्रति लाभार्थी 400 रुपया मिलता है। पुरुष नसबंदी परिवार को नियोजित करने का एक सुरक्षित और सरल तरीका है, जो परिवार नियोजन में पुरुषों की भागीदारी को बढ़ावा देता है।
परिवार नियोजन कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ. संजीव वर्मन ने बताया कि महिलाओं की तुलना में पुरुष नसबंदी आसान हैं। पुरुष नसबंदी के लिए कुछ मानक भी तय किये गये हैं जिनके अनुसार उन पुरुषों को नसबंदी की सेवा अपनानी चाहिए जो शादी-शुदा हों और जिनकी उम्र 60 वर्ष से कम हो। उनके पास कम से कम एक बच्चा होना चाहिए। बच्चे की उम्र एक वर्ष से अधिक हो। पुरुष नसबंदी तभी करवानी चाहिए। जब पत्नी ने नसबंदी न करवाई हो। नसबंदी अपनाने वाले लाभार्थी को 3000 रुपये की प्रोत्साहन राशि भी मिलती है। उन्होंने लक्षित वर्ग से अपील की है कि भय और भ्रांतियां को दूर करके पुरुष नसबंदी को अवश्य बनाएं। यह पूरी तरह सुरक्षित है साथ ही अपने आसपास के लोगों को सुरक्षित स्थाई विधि के विकल्प को अपनाने के लिए प्रेरित करें लिए प्रेरित करें।
पुरुष नसबंदी पखवाड़े के चरण
मोबिलाईजेशन चरण (21 नवंबर से 27 नवंबर तक)रू इस चरण में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और पुरुषों को परिवार नियोजन के महत्व के बारे में जानकारी दी जाएगी।
सेवा प्रदायगी चरण (28 नवंबर से 4 दिसंबर तक)रू इस चरण में पुरुषों को नसबंदी सेवाएं प्रदान की जाएंगी।
इस अभियान के उद्देश्यर :
पुरुषों को परिवार नियोजन में शामिल करना।
परिवार नियोजन के महत्व को बढ़ावा देना।
पुरुषों को स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में जानकारी देना।
परिवार नियोजन के लाभों को बढ़ावा देना
: गर्भावस्था में जरूर कराएं मधुमेह की जांच, जच्चा-बच्चा पर पड़ सकता है असर
Wed, Nov 13, 2024
विश्व मधुमेह दिवस (14 नवम्बर 2024) आज
गर्भवस्था की पहली तिमाही से प्रसव पूर्व जांचें जरूरी
सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर जांचों की सुविधा है उपलब्ध
आगरा। गर्भावस्था के दौरान मधुमेह नियंत्रित न हो तो यह गर्भवती के साथ-साथ पैदा होने वाला शिशु के लिए भी मुसीबत बन सकती है। इसलिए गर्भावस्था की पहली तिमाही के दौरान ही गर्भवती को अपनी प्रसव पूर्व जांच करानी चाहिए। इस दौरान रैंडम ब्लड शुगर (आरबीएस) जांच कराई जाती है। जिन गर्भवती में गर्भावस्था में मधुमेह की पुरानी पृष्ठभूमि रही है उनकी प्रथम त्रैमास में ही मधुमेह की सम्पूर्ण जांच कराई जाती है और अन्य गर्भवती की भी दूसरे त्रैमास में मधुमेह की पूरी जांच कराई जाती है ।
बच्चों को टाइप-दो मधुमेह होने की आशंका
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने डॉ. अरुण श्रीवास्तव ने सभी गर्भवती महिलाओं से अपील करते हुए कहा कि सभी गर्भवती महिलाएं गर्भावस्था की पहली तिमाही से ही अपने नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर प्रसव पूर्व जांच अवश्य कराएं। यह जच्चा और पैदा होने वाले बच्चे दोनों के लिए लाभदायक है। उन्होंने बताया कि गर्भावधि मधुमेह में रक्त शर्करा का मान सामान्य से अधिक होता है लेकिन मधुमेह के निदान से कम हो जाता है। गर्भावधि मधुमेह सिर्फ गर्भावस्था के दौरान ही होता है। इससे पीड़ित महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के दौरान जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। इन महिलाओं और संभवतः उनके बच्चों को भी भविष्य में टाइप-दो मधुमेह की आशंका अधिक होती है। गर्भावधि मधुमेह का निदान लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि प्रसवपूर्व जांच के माध्यम से किया जाता है, इसलिए प्रत्येक महिला को गर्भावस्था का पता चलते ही नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर तुरंत जांच करानी चाहिए। सरकारी अस्पतालों पर न सिर्फ जांच की सुविधा है, बल्कि गर्भावस्था में मधुमेह का पता चलने पर जांच के साथ साथ कुशल इलाज व प्रबंधन से सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित कराया जा रहा है।
एसीएमओ आरसीएच डॉ. संजीव वर्मन ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान मधुमेह के मामले औसतन दस फीसदी से भी कम आते हैं, लेकिन इन मामलों में सतर्कता अधिक जरूरी है। मधुमेह पाए जाने पर गर्भवती को उच्च जोखिम गर्भावस्था (एचआरपी) की श्रेणी में रखा जाता है और सुरक्षित प्रसव होने तक उनकी नियमित निगरानी की जाती है। उन्हें मधुमेह की दवाएं भी चलाई जाती हैं। अगर गर्भधारण करने के पहले से ही महिला मधुमेह पीड़ित है तो गर्भावस्था के दौरान उसे चिकित्सकीय देखरेख में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी। मधुमेह पीड़ित महिला को गर्भधारण में भी परेशानी हो सकती है।
गैर संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम नोडल अधिकारी डॉ. पियूष जैन ने बताया कि जनपद में सरकारी स्वास्थ्य इकाइयों पर 6519 लोगों को मधुमेह के रोगियों को उपचार दिया जा रहा है। इनमें 3563 पुरुष और 2956 महिलाएं हैं। सभी का उपचार किया जा रहा है।
जीवनी मंडी नगरीय स्वास्थ्य केंद्र की प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. मेघना शर्मा ने बताया कि अगर गर्भावस्था में मधुमेह नियंत्रित नहीं रहता है तो शिशु के लिए अधिक दिक्कत बढ़ सकती है। गर्भावस्था के पहले आठ सप्ताह के दौरान शिशु के अंग, जैसे मस्तिष्क, हृदय, गुर्दे और फेफड़े आदि बनने लगते हैं। इस चरण में उच्च रक्त शर्करा का स्तर हानिकारक हो सकता है । इससे शिशु में जन्म दोष, जैसे कि हृदय दोष या मस्तिष्क अथवा रीढ़ की हड्डी में दोष होने की आशंका बढ़ जाती है। गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्त शर्करा स्तर के कारण इस बात की आशंका भी बढ़ जाती है कि शिशु समय से पहले पैदा हो जाए या उसका वजन बहुत अधिक हो जाए अथवा जन्म के तुरंत बाद उसे सांस लेने में समस्या हो या रक्त शर्करा का स्तर कम हो जाए। इसकी वजह से गर्भपात या मृत शिशु के जन्म की आशंका भी बढ़ जाती है ।
मधुमेह के कारण शिशु में जटिलताएं :
जन्म के समय अधिक वजनरू मधुमेह से पीड़ित माताओं के शिशु का वजन अधिक हो सकता है, जिससे प्रसव के समय समस्याएं आ सकती हैं।
श्वसन समस्याएंरू शिशु में श्वसन समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि श्वसन की गति धीमी होना।
हृदय समस्याएंरू मधुमेह से पीड़ित माताओं के शिशु में हृदय समस्याएं हो सकती हैं।
मानसिक विकास में देरीरू मधुमेह से पीड़ित माताओं के शिशु में मानसिक विकास में देरी हो सकती है।
गर्भावस्था में मधुमेह की जांच और उपचार :
गर्भावस्था के दौरान मधुमेह की जांच और उपचार बहुत जरूरी है। मधुमेह की जांच के लिए रक्त परीक्षण किया जाता है। यदि मधुमेह की पुष्टि होती है, तो डॉक्टर उपचार की सलाह देते हैं, जैसे कि इंसुलिन थेरेपी और आहार परिवर्तन।
गर्भावस्था में मधुमेह की रोकथाम के उपाय :
स्वस्थ आहार : स्वस्थ आहार लेने से मधुमेह के खतरे को कम किया जा सकता है।
नियमित व्यायाम : नियमित व्यायाम करने से मधुमेह के खतरे को कम किया जा सकता है।
वजन नियंत्रण : वजन नियंत्रण करने से मधुमेह के खतरे को कम किया जा सकता है